इजरायल के आम चुनाव के बाद सरकार गठन को लेकर राजनीतिक तस्वीर स्पष्ट नहीं हो पाई है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और विपक्षी नेता गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले गुटों में से किसी को भी स्पष्ट बहुमत मिलने की उम्मीद नहीं है। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन लगभग 53 सीटों पर और विपक्षी गुट करीब 48 सीटों पर आगे है। वहीं, अरब-नेतृत्व वाले दलों को 18 से 19 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है।
120 सदस्यीय इजरायली संसद यानी नेसेट में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है। ऐसे में किसी भी गुट के पास अकेले सरकार बनाने लायक संख्या नहीं दिख रही है। अब सरकार गठन के लिए राजनीतिक दलों के बीच बातचीत और गठबंधन की संभावनाएं अहम हो गई हैं।
इजरायल की केंद्रीय चुनाव समिति ने बैलेट वोटों की गिनती पूरी कर ली है। आधिकारिक नतीजे 4 नवंबर को घोषित किए जाएंगे। शुरुआती आकलन के अनुसार, शेष मतों से चुनावी तस्वीर में बड़े बदलाव की संभावना कम है।
इजरायली संसद में सीटों का गणित क्या है?
इजरायल में नेसेट की सीटें आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत बांटी जाती हैं। किसी पार्टी को संसद में प्रवेश और सीटें हासिल करने के लिए कुल राष्ट्रीय मतों का कम से कम 3.25 प्रतिशत प्राप्त करना जरूरी है।
इस चुनाव में लगभग एक दर्जन पार्टियों के इस सीमा को पार करने की संभावना है। इसी वजह से अंतिम सीटों का बंटवारा और सरकार बनाने का गणित महत्वपूर्ण बना हुआ है।
शुरुआती अनुमानों के मुताबिक सीटों की स्थिति इस प्रकार है:
- नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गुट: लगभग 53 सीटें।
- गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाला विपक्षी गुट: लगभग 48 सीटें।
- अरब-नेतृत्व वाले दल: लगभग 18 से 19 सीटें।
इन आंकड़ों के आधार पर किसी भी पक्ष को अपने दम पर बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। ऐसे में छोटे दलों और संभावित सहयोगियों की भूमिका सरकार गठन में अहम हो सकती है।
नेतन्याहू के सामने सरकार बनाने के कौन से विकल्प हैं?
नेतन्याहू की लिकुड पार्टी चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उनके गुट की अनुमानित 53 सीटें बहुमत के आंकड़े से आठ कम हैं। ऐसे में उन्हें सरकार बनाने के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा।
एक विकल्प छोटे दलों को अपने साथ लाने या विपक्ष के कुछ सांसदों का समर्थन हासिल करने का है। हालांकि, राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए यह आसान नहीं माना जा रहा है।
दूसरी संभावना राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने की है। इसके तहत नेतन्याहू और विपक्ष के प्रमुख नेता गादी आइसेनकोट साथ आ सकते हैं। ऐसी व्यवस्था में दोनों नेताओं के बीच प्रधानमंत्री पद साझा करने का समझौता भी हो सकता है, जिसमें वे बारी-बारी से दो-दो साल के लिए जिम्मेदारी संभालें।
क्या विपक्ष अरब-नेतृत्व वाले दलों के साथ सरकार बना सकता है?
गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को भी अपने दम पर बहुमत नहीं मिलता दिख रहा है। यदि उसे लगभग 18 से 19 सीटें जीतने की संभावना वाले अरब-नेतृत्व वाले दलों का समर्थन मिलता है, तो बहुमत का आंकड़ा पार किया जा सकता है।
हालांकि, वैचारिक मतभेद और राजनीतिक जटिलताएं ऐसे गठबंधन की राह कठिन बना सकती हैं। इसलिए विपक्ष के सामने भी सरकार बनाने के लिए समर्थन जुटाने की चुनौती बनी हुई है।
विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों से बढ़ा राजनीतिक तनाव
अंतिम नतीजों से पहले इजरायल में राजनीतिक माहौल उस समय और गर्म हो गया, जब केंद्रीय चुनाव समिति के प्रमुख ने कथित विदेशी हस्तक्षेप की जांच के लिए शिन बेट को निर्देश दिया।
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस मुद्दे पर कहा कि किसी भी यहूदी दल को अरब-नेतृत्व वाले दलों के साथ सहयोग नहीं करना चाहिए।
वहीं, विपक्षी नेताओं ने नेतन्याहू पर आरोप लगाया कि वह चुनाव परिणामों और जनता की इच्छा को कमजोर करने के लिए ऐसे कदम उठा रहे हैं। डेमोक्रेट्स पार्टी के प्रमुख यायर गोलान और अरब नेताओं ने इसे जनता को भड़काने वाला अभियान बताया है।
सरकार गठन में राष्ट्रपति की क्या भूमिका होगी?
आधिकारिक चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं से बातचीत करेंगे। इसके बाद वह उस नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे, जिसके संसद में बहुमत जुटाने की सबसे अधिक संभावना होगी।
नामित नेता को सरकार गठन के लिए शुरुआत में 28 दिन मिलेंगे। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति इस अवधि को 14 दिन और बढ़ा सकते हैं। इस तरह सरकार बनाने के लिए अधिकतम 42 दिन का समय मिल सकता है।
इस अवधि में संबंधित नेता को सहयोगी दलों का समर्थन जुटाकर नेसेट में बहुमत साबित करना होगा।
राष्ट्रीय एकता सरकार या फिर नए चुनाव?
इजरायल के सामने एक विकल्प राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने का भी है। देश की सुरक्षा चुनौतियों और आर्थिक स्थिरता को ध्यान में रखते हुए इस संभावना पर चर्चा हो सकती है, ताकि बार-बार चुनाव कराने की स्थिति से बचा जा सके।
यदि कोई भी नेता तय समयसीमा के भीतर सरकार बनाने में सफल नहीं होता और दूसरे विकल्प भी काम नहीं आते, तो संसद भंग कर नए चुनाव कराए जा सकते हैं।
इजरायल में 2019 से 2022 के बीच राजनीतिक गतिरोध के कारण पांच बार चुनाव हो चुके हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के सामने स्थिर सरकार बनाने की चुनौती बनी हुई है।
नई सरकार बनने तक क्या होगा?
जब तक नई सरकार का गठन नहीं हो जाता, बेंजामिन नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में पद पर बने रहेंगे। कार्यवाहक सरकार की नीतिगत और बड़े फैसले लेने की शक्तियां सीमित होती हैं, लेकिन वह प्रशासनिक कामकाज जारी रखती है।
इजरायल के सामने कौन से बड़े मुद्दे हैं?
सरकार गठन की चर्चा के बीच देश में कई संवेदनशील मुद्दे भी राजनीतिक बहस का हिस्सा हैं।
- अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स समुदाय को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने का विवाद एक बड़ा सामाजिक सवाल बना हुआ है।
- नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। आलोचकों का आरोप है कि उन्होंने राजनीतिक लाभ और सत्ता में बने रहने के लिए गाजा संघर्ष तथा बंधकों की रिहाई से जुड़े समझौतों में देरी की।
- गाजा में फलिस्तिनियों के साथ व्यवहार और वेस्ट बैंक में बढ़ती हिंसा के कारण इजरायल की अंतरराष्ट्रीय छवि प्रभावित हुई है।
- ईरान के साथ तनाव और संभावित हमलों का खतरा भी राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ाने वाले मुद्दों में शामिल है।
इजरायल के अगले कुछ हफ्तों की राजनीतिक बातचीत और दलों के बीच होने वाले समझौते तय करेंगे कि देश में स्थिर सरकार बन पाती है या फिर नए चुनाव कराने की नौबत आती है।