दिल्ली में पढ़ने आया छात्र जब रात को अपने PG के कमरे में लौटता है, तो उसकी चिंता पढ़ाई, परीक्षा और करियर को लेकर होनी चाहिए। लेकिन साउथ कैंपस के पास सत्या निकेतन में पांच मंजिला इमारत ढहने और छह लोगों की मौत ने छात्रों की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या दिल्ली में पढ़ने आए छात्रों को रहने के लिए सुरक्षित छत मिल रही है?
दिल्ली में उच्च शिक्षा का दायरा काफी बड़ा है। दिल्ली Economic Survey 2025-26 के मुताबिक, 2024-25 में राजधानी में 214 उच्च शिक्षण संस्थान थे और इनमें 11.40 लाख छात्र नामांकित थे। यानी दिल्ली देशभर से पढ़ाई और करियर के सपने लेकर आने वाले लाखों छात्रों का ठिकाना है।
लेकिन कॉलेज में दाखिला मिलने के बाद छात्रों के सामने एक और सवाल होता है—रहेंगे कहां?
हॉस्टल नहीं मिलने पर PG बनते हैं सहारा
हर छात्र को विश्वविद्यालय का हॉस्टल नहीं मिल पाता। ऐसे में निजी PG और किराये के कमरे उनकी जरूरत बन जाते हैं। सत्या निकेतन इसका बड़ा उदाहरण है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस से लगे इस इलाके में 200 से ज्यादा PG accommodations हैं। यहां छोटे-छोटे कमरों के लिए छात्रों से ₹15,000 तक महीना किराया लिया जा रहा है।
छात्र कॉलेज की फीस के साथ रहने पर भी हजारों रुपये खर्च करते हैं। ऐसे में उन्हें सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि एक सुरक्षित कमरा और सुरक्षित इमारत मिलना भी जरूरी है।
इमारतों की सुरक्षा पर कितनी निगरानी?
सबसे बड़ा सवाल इमारतों की सुरक्षा को लेकर है। MCD के 2026 प्री-मानसून सर्वे में 32.55 लाख से ज्यादा इमारतों को सर्वे के दायरे में रखा गया था। 2 जुलाई तक करीब 29.94 लाख इमारतों का सर्वे पूरा हुआ।
इनमें सिर्फ 27 इमारतों को ‘अनसेफ’ घोषित किया गया, जबकि 125 जर्जर इमारतों को मरम्मत के लिए नोटिस दिया गया।
इसके बावजूद सवाल बना हुआ है कि इतने बड़े सर्वे के बाद भी क्या इमारतों की सुरक्षा से जुड़ी पूरी तस्वीर सामने आई?
सत्या निकेतन में जिस इमारत में PG चल रहा था, वह करीब 40-50 साल पुरानी बताई गई है। MCD के शुरुआती आकलन में यह भी सामने आया कि इमारत का स्वीकृत नक्शा नहीं था और बेसमेंट में अनधिकृत निर्माण/काम हुआ था।
सत्या निकेतन पहला मामला नहीं
यह घटना अकेली नहीं है। NCRB के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में आवासीय इमारतों के ढहने के 25 मामले दर्ज हुए और इनमें 30 लोगों की मौत हुई।
इसलिए सवाल सिर्फ सत्या निकेतन की एक इमारत तक सीमित नहीं है। मुद्दा उस व्यवस्था का भी है, जिसमें छात्र अपने माता-पिता से दूर पढ़ने आते हैं और हर महीने हजारों रुपये देकर जिस छत के नीचे रहते हैं, उसकी मजबूती को लेकर उनके पास पूरा भरोसा नहीं होता।
Structural audit और safety certification की जरूरत
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने PG, स्कूल, नर्सिंग होम और दूसरी सार्वजनिक उपयोग वाली इमारतों के लिए नियमित structural audit और safety certification की व्यवस्था बनाने की बात कही है।
लेकिन सवाल सिर्फ इमारत को सील करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह भी तय होना जरूरी है कि जिस इमारत को खतरनाक घोषित किया गया हो, जिस पर शिकायत हुई हो या जिसका निरीक्षण होना था, वहां हादसा होने पर जिम्मेदारी किसकी होगी और संबंधित अधिकारी के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी।
जवाबदेही केवल मकान मालिक तक सीमित नहीं हो सकती। अगर सिस्टम ने खतरे को देखा और फिर भी कार्रवाई नहीं हुई, तो सिस्टम के जिम्मेदार लोगों से भी सवाल होना चाहिए।
दिल्ली देशभर से आने वाले युवाओं को उनके भविष्य के लिए मंच देती है। ऐसे में उन्हें कम से कम ऐसी सुरक्षित छत मिलनी चाहिए, जिसके नीचे सोते समय उनके माता-पिता को यह डर न हो कि सुबह उनका बच्चा सुरक्षित उठेगा या नहीं।