इजरायल के आम चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकॉट के बीच मुकाबले के बीच ईरान को लेकर देश की रणनीति पर भी नजर है। शुरुआती चुनावी आंकड़ों और एग्जिट पोल के मुताबिक, किसी भी खेमे को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। ऐसे में सवाल सिर्फ सत्ता बदलने का नहीं, बल्कि यह भी है कि अगर आइजेनकॉट प्रधानमंत्री बनते हैं, तो ईरान के खिलाफ इजरायल की नीति किस दिशा में जाएगी।
इजरायल की 120 सीटों वाली संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत होती है। मौजूदा चुनावी स्थिति में नेतन्याहू के दक्षिणपंथी-धार्मिक गठबंधन और आइजेनकॉट के विपक्षी गुट के बीच कड़ा मुकाबला बताया जा रहा है। स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में सरकार गठन के लिए गठबंधन की राजनीति अहम हो सकती है।
इजरायल चुनाव 2026 में क्या है सीटों का समीकरण?
तीन साल लंबे युद्ध और राजनीतिक उथल-पुथल के बाद हुए इन चुनावों में नेतन्याहू और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकॉट आमने-सामने हैं। शुरुआती एग्जिट पोल में दोनों खेमों के बीच बराबरी की टक्कर के संकेत बताए गए हैं।
नेसेट में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी होने के कारण चुनाव के अंतिम नतीजे सरकार गठन की तस्वीर साफ करेंगे। फिलहाल किसी भी पक्ष को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की बात कही गई है। ऐसे में आने वाले हफ्तों में गठबंधन बनाने और राजनीतिक समर्थन जुटाने की प्रक्रिया निर्णायक हो सकती है।
ईरान को लेकर बेंजामिन नेतन्याहू की क्या है रणनीति?
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का रुख ईरान को लेकर सख्त रहा है। उनका मानना है कि इजरायल की स्थायी सुरक्षा और शांति के लिए ईरान की मौजूदा सरकार का अंत जरूरी है। वह अमेरिका, खासकर राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के साथ अपने संबंधों को इजरायल की सुरक्षा के लिए अहम मानते हैं।
चुनाव से पहले ऐसी रिपोर्ट्स भी आईं कि नेतन्याहू ने ईरान पर अमेरिका के साथ मिलकर संयुक्त सैन्य हमले के लिए दबाव बनाया था। हालांकि, व्हाइट हाउस ने फिलहाल इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी।
इधर, नेतन्याहू के आलोचकों का आरोप है कि वह अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार के मामलों और राजनीतिक संकट के बीच सत्ता में बने रहने के लिए युद्ध को लंबा खींचने की कोशिश कर रहे हैं। चुनाव टालने की कोशिशों को लेकर भी उन पर सवाल उठाए गए हैं।
गादी आइजेनकॉट के प्रधानमंत्री बनने पर क्या बदलेगा?
पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकॉट की ईरान नीति नेतन्याहू से अलग बताई जाती है। गाजा युद्ध में अपने बेटे को खोने वाले आइजेनकॉट का मानना है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन कराना व्यावहारिक लक्ष्य नहीं है। वह नेतन्याहू की युद्ध नीति को खराब योजना करार देते हैं।
आइजेनकॉट ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ सीमित सैन्य हमलों के पक्षधर हैं, लेकिन व्यापक युद्ध या बार-बार सैन्य अभियान चलाने के बजाय आर्थिक प्रतिबंधों और कूटनीति को ज्यादा प्रभावी तरीका मानते हैं।
इसलिए अगर आइजेनकॉट का गठबंधन सरकार बनाने में सफल होता है, तो ईरान के खिलाफ इजरायल की रणनीति में सैन्य कार्रवाई के साथ कूटनीतिक और आर्थिक दबाव को अधिक महत्व दिए जाने की संभावना हो सकती है। हालांकि, अंतिम नीति सरकार बनने और उसके फैसलों पर निर्भर करेगी।
अमेरिका पर निर्भरता कम करना चाहते हैं आइजेनकॉट
अमेरिका के साथ संबंधों को लेकर भी दोनों नेताओं की सोच में अंतर बताया गया है। नेतन्याहू अमेरिकी समर्थन को इजरायल की सुरक्षा के लिए बेहद अहम मानते हैं। इसके विपरीत, आइजेनकॉट का कहना है कि इजरायल को अमेरिका पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहने के बजाय अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए और स्वतंत्र रूप से फैसले लेने चाहिए।
आइजेनकॉट एक ऐसे आधुनिक इजरायल की भी बात करते हैं, जहां यहूदी और अरब नागरिक साथ रह सकें। यदि उनका गठबंधन सत्ता में आता है, तो इसका असर देश की आंतरिक राजनीति के साथ अमेरिका और अरब जगत के साथ इजरायल के कूटनीतिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।
इजरायल चुनाव के नतीजों से तय होगी आगे की दिशा
इजरायल के चुनाव में नेतन्याहू की सख्त सैन्य नीति और आइजेनकॉट की कूटनीति, आर्थिक प्रतिबंधों तथा स्वतंत्र फैसलों पर जोर देने वाली सोच के बीच अंतर साफ दिखाई देता है।
फिलहाल किसी भी खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बीच अंतिम चुनावी नतीजे और सरकार गठन की प्रक्रिया अहम होगी। इसके बाद बनने वाली सरकार ही तय करेगी कि ईरान के खिलाफ इजरायल की रणनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी और क्षेत्रीय कूटनीति पर उसका क्या असर पड़ सकता है।